कभी-कभी पहाड़ों में हिमस्खमलन सिर्फ एक ज़ोरदार आवाज़ से ही शुरू हो जाता है

Wednesday, May 29, 2013

इन स्त्री-विरोधी अपराधों की जड़ कहाँ है?



दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को हुई घटना के बाद से महिलाओं के खि़लाफ़ घिनौने अपराधों की बाढ़ सी आयी हुई है। ये कैसे समाज में जी रहे हैं आज हम लोग? किस ज़मीन पर पैदा हो रहे हैं ये ज़हरीले साँप।इस प्रकार के अपराधों में अव्वल तो पुलिस रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करती है, जाँच करती भी है तो भारत में बलात्कार के 74 प्रतिशत आरोपी छूट जाते हैं और बहुत से मामलों की रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती। ऐसे अपराधों में पिछले दो दशकों में जो तेज़ी आयी है उसका एक कारण छुपा है उन नवउदारवादी लुटेरी आर्थिक नीतियों में जिसके चलते खाओ-पीओ-ऐश करो की बीमार संस्कृति पूरे देश में पसरी है। पूँजीवादी लोभ-लालच और घोर ऐंद्रिक भोगवादी कुसंस्कृति ने स्त्रियों को एक ‘माल‘ बना डाला है। इन लुटेरी आर्थिक नीतियों के चलते एक तरफ़ एक पतित नवधनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है जो शराब के नशे में काले शीशे लगी गाडि़यों में महिलाओं को खींचकर उनसे बलात्कार करता है। वहीं दूसरी तरफ़ मेहनतकश वर्गों के एक छोटे से हिस्से का भी बेरोज़ग़ारी, ग़रीबी आदि की मार से उपजी निराशा, हताशा, कुण्ठा के चलते भयंकर अमानवीकरण हुआ है और ये लम्पट सर्वहारा भी इसी नवधनाढ्य वर्ग की कुसंस्कृति और तौर-तरीकों का अनुसरण करते हुये उनके पिछलग्गू बन जाते हैं। अनायास नहीं है कि गांव-देहातों में ग़रीब व दलित महिलाओं के साथ बदसलूकी का मामला हो या शहर में बसों/ सड़कों पर चलती आम महिलाओं का मसला हो, दोनों जगह इन्हीं तत्वों का हाथ इन अपराधों में आपको साफ़ नज़र आ जायेगा। 
बेशक, इन स्त्री-विरोधी अपराधों को पूरी तरह तो तभी ख़त्म किया जा सकता है जब इन्हें बढ़ावा देनेवाले आर्थिक-सामाजिक ढाँचे को ही बदल डाला जाये। लेकिन तब तक तक क्या हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे रहा जाये? क़ानूनों को सख़्त बनाने, फ़ास्ट-ट्रैक अदालतें लगाकर नियत समय में अपराधियों को उचित सज़ाएँ देने और क़ानूनी ख़ामियों को दूर करने की तात्कालिक माँगें तो ज़रूरी हैं। ऐसे मामलों में संबंधित जाँच-अधिकारी की जि़म्मेदारी भी तय की जानी चाहिये व इरादतन या गैर-इरादतन सही जाँच न करने पर उन्हें भी कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिये। लेकिन इसके साथ ही कालोनियों-मुहल्लों में हमें चौकसी दस्ते बनाने होंगे जिनमें स्वयं स्त्रियाँ और नौजवान शामिल हों। शराब और नशे के कारोबार के तमाम अड्डों, अश्लील क्लिपिंग्स डाउनलोड करने वाली मोबाइल रीचार्जिंग की दुक़ानों,लम्पट तत्वों के उठने-बैठने के तमाम अड्डों आदि पर इन चौकसी दस्तों को धावा बोलना चाहिए,ठीक वैसे ही जैसे कभी उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ की बहादुर महिलाओं ने किया था। अग़र हमें अपनी बच्चियों को बचाना है, स्त्रियों के सम्मान की हिफ़ाज़त करनी है, तो ये करना ही होगा। और कोई चारा भी तो नहीं है सिवाय इसके कि अपनी हिफ़ाजत स्वयं की जाये और अपनी आज़ादी व सम्मान के लिये डट कर लड़ा जाये!






Friday, April 19, 2013

बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन- कुपोषण या शोषण?



यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार विश्व के हर तीन कुपोषित बच्चों में से एक बच्चा भारत में रहता है जहाँ हर साल तक़रीबन बीस लाख बच्चे (हर रोज़ तक़रीबन नौ हज़ार) पांच साल की उम्र से पहले भूख, कुपोषण और उचित स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मर जाते हैं। परंतु सरकार, सभी नेता, उद्योगपति और पूँजीपतियों के टुकड़ाखोर इन बच्चों  की मौत का जिम्मेदार भी जनता को ही ठहराकर अपने आप को निर्दोष साबित करना चाहते हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा ’कुपोषण भारत छोड़ो’ के नाम से चल रहा अभियान है जिसका ‘ब्रांड एंबेसडर’ आमिर ख़ान को बनाया गया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य जनता की आँखों में धूल झोंक कर यह सिद्ध करना है कि कुपोषण से होने वाली इन मौतों का मुख्य कारण लोगों में जागरुकता की कमी है न कि मुनाफ़े और लाभ पर केन्द्रित पूँजीवादी नीतियाँ। इसका मतलब है कि इस देश के ग़रीब और मेहनतकश लोगों के बच्चे पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण दम नही तोड़ते, बल्कि इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का “पता नही चलता“ कि उनका बच्चा कुपोषण से पीड़ित है! मीडिया द्वारा “विकास पुरुष“ के नाम से प्रचारित नरेंद्र मोदी ने भी एक बयान में कहा था कि गुजरात की महिलाओं और बच्चों में लगातार बढ़ रहे कुपोषण का मुख्य कारण है लड़कियों का स्वास्थ्य से ज़्यादा अपने सौंदर्य पर ध्यान देना।
 ऐसे उलजुलूल बयानों से साफ़ पता चलता है कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाली सरकारें भूख और कुपोषण से दम तोड़ते इन बच्चों के प्रति कितनी संजीदा हैं। जहाँ एक तरफ़ तो हर साल लाखों टन अनाज ज़रूरतमन्द लोगों तक पहुँचने की बजाये गोदामों में पड़े-पड़े सड़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ़ खाद्य पदार्थों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी के बीच हर रोज़ 20 रुपए से भी कम में गुज़ारा करने वाले 77 फ़ीसदी लोगों  के लिए पौष्टिक भोजन तो दूर, बल्कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल है।


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लगातार बढ़ रही विकास दर“ का राग अलापने वाली यह सरकार आज भी अपनी कुल जी.डी.पी का एक फ़ीसदी से भी कम हिस्सा स्वास्थ्य-संबंधी योजनाओं  पर खर्च करती है जबकि यूनिसेफ़ ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि कुपोषण से होने वाली इन मौतों का एक मुख्य कारण स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। एक तरफ़ ये सरकारें जनस्वास्थ्य सुविधाओं पर होने वाले ख़र्च को बढ़ाने की बजाये उसे लगातार घटाकर मंहगे निजी अस्पतालों-क्लीनिकों को जनता को लूटने की खुली छूट देते हुये कुपोषण के मूल कारणों को समाप्त करने के बजाये जनता की मेहनत से ज़्यादा मुनाफ़ा निचोड़ने के लिये नीतियाँ बनाती हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ विज्ञापन एजेंसी और आमिर खान जैसों को साथ लेकर कुपोषण दूर करने के नाम पर जनता के सामने खोखली नारेबाज़ी करके समस्याओं के मूल कारणों के प्रति विभ्रम पैदा कर रही हैं। मॅक्कन  ग्रुप, जो कि इस पूरे अभियान मे सरकार का मुख्य सहयोगी है, के प्रमुख क्लाइंटो में नेस्ले जैसी कंपनिया शामिल है जिसके हाथ ग़रीब देशों के हज़ारों बच्चों के ख़ून से रंगे हैं जो नेस्ले का दूध पीकर असमय मौत का शिकार हुये और खु़द आमिर ख़ान कोका-कोला जैसी कंपनियों के विज्ञापनों मे काम कर चुके हैं जिस पर समय-समय पर ख़तरनाक़ रसायनों को अपने पेयजल मे इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं व अपने मुनाफ़े को बचाने के लिये ये कम्पनियां लातिन अमेरिकी देशों  में लोकप्रिय सरकारों का तख़्तापलट करवाती रही हैं!
इस तरह के अभियानों का मुख्य मक़सद लोगों की आँखों में धूल झोंकना और समस्याओं के मूल कारणों के बारे में उन्हें गुमराह करना होता है। संसद में बैठे और सरकारी आवासों में विलासिता के साथ रहने वाले इन तमाम नेताओं  की नज़र में देश की मेहनतकश जनता की जान की कोई क़ीमत नही है। उनके लिए जनता महज़ एक वोट बैंक है जिसका इस्तेमाल तमाम चुनावी पार्टियाँ हर पाँच साल में सत्ता हथियाने के लिए करती हैं। आजा़दी के इन 66 वर्षों के अनुभव से यह बात एकदम स्पष्ट हो चुकी है कि ग़रीबी, भुख़मरी, और कुपोषण का ख़ात्मा मुनाफ़े और लूट-खसोट पर टिकी इस अमानवीय व्यवस्था में संभव नही है। क्या आज हर संवेदनशील नागरिक का यह फर्ज़ नहीं बनता है कि वह ऐसी अमानवीय व्यवस्था को उखाड़ फेंके जहाँ बहुसंख्यक जनता की मेहनत पर कुछ लोग अय्याशी कर रहे है? ग़रीबी व कुपोषण का ख़ात्मा तो एक शोषणमुक्त समाज में ही संभव है जहाँ हर मेहनत करने वाले व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा फल मिलता हो और जहाँ समाज के सभी बच्चों और हर नागरिक को बिना किसी भेद-भाव के एक इंसान की तरह जीने की वास्तविक आज़ादी हो।

Sunday, March 31, 2013

शहीद दिवस (23 मार्च) पर नौजवानों और युवाओं के नाम!

भगतसिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों द्वारा भारत की आज़ादी के संघर्ष के दौरान इस्तेमाल किये गये यह दो शब्द आज भी हर इंसाफ़ पसन्द इंसान की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। इन शहीदों के यह शब्द हमें सोचने के लिये मजबूर करते हैं कि आज आज़ादी के 66 साल बाद भी हर तरफ़ मौजूद बेकारी,ग़ैर-बराबरी और ग़रीबी का कारण क्या है? और हमारे सामने एक सवाल खड़ा हो जाता है कि इन शहीदों के सपने क्या थे और वे समाज और आज़ादी के बारे में क्या सोचते थे? भगतसिंह को ज्यादातर लोग असेम्बली में बम फेंकने वाले एक जोश भरे क्रान्तिकारी नौजवान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन एक विचारक के रूप में लोग उन्हें नहीं जानते। आज भी ज़्यादातर लोग उनके विचार और उनके सिद्धान्तों से अपरिचित हैं। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि यहाँ की तमाम चुनावी पार्टियों ने भगत सिंह के विचारों को जनता तक कभी पहुँचने ही नही दिया क्योंकि वे इस बात से डरते थे और आज भी ड़रते है कि अगर भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचार जनता तक पहुँच गए तो जिस जनता को धोखा देकर वह हुकू़मत कर रहे हैं वही जनता सच्चाई को समझकर उन्हे उखाड़ फेंकेगी। असेम्बली में बम फेंकने के बाद के दिनों में जेल में रहते हुये भगतसिंह और उनके साथियों ने अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया। इस दौरान भगतसिंह ने कई महत्वपूर्ण लेख लिखे जो 1986 में पहली बार प्रकाशित किये गये। इन लेखों में भगतसिंह के क्रान्ति और समाज के निर्माण के बारे में उनके सारे मत बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। जेल में रहकर अध्ययन करते हुये भगत सिंह वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों के करीब पहुंच चुके थे और अपने अन्तिम दिनों में रूसी क्रान्तिकारी नेता लेनिन का जीवन परिचय पढ़ रहे थे। भगतसिंह और उनके साथी कैसी आज़ादी की बात कर रहे थे और कैसा समाज चाहते थे उसकी एक झलक अदालत में दिये गये उनके इस बयान में भी देखने को मिलती है कि "क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।" व्यवस्था में जिस आमूल परिवर्तन की बात भगतसिंह कर रहे थे उसका अर्थ था एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जहाँ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण को असम्भव बना दिया जाये। वह एक ऐसे शोषणविहीन समाज के निर्माण का सपना देख रहे थे जहाँ मेहनतकश जनता ही राजकाज से संबंधित फैसले ले व जहां पूँजी द्वारा श्रम के शोषण को असम्भव बना दिया जाये। आज 66 साल के पूँजीवादी ढंग के विकास के बाद लूट, लालच, और मुनाफे़ पर टिके जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें भगतसिंह की बातें और भी प्रासंगिक हो गयी हैं! आज जहाँ एक ओर देश की अर्थव्यवस्था लगातार उछाल पर है वहीं दूसरी ओर देश की 80 फ़ीसदी मेहनत-मज़दूरी करने वाली आबादी बेरोजग़ारी और शोषण की चक्की में पिसते हुये हवसख़ोर मालिकों की तिजोरी भरते हुये  नर्क में जीने के लिये मजबूर है और देश की 77 फ़ीसदी आबादी रोज़ाना 20 रुपयों से भी कम आमदनी पर जी रही है। वर्तमान पूँजीवादी सत्ता द्वारा लगातार ठेकाकरण को बढ़ावा देने और श्रम क़ानूनों को तिलांजलि देने के बाद आज पूरे देश की 93 फ़ीसदी मज़दूर आबादी बिना किसी श्रम क़ानून के ठेके पर काम कर रही है। ऐसी स्थिति में श्रम की लूट पर खड़ी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती देने के लिये भगतसिंह के विचार आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि तब थे जब कि भारत ब्रिटेन का गुलाम था। भगत सिंह ने कहा भी था कि ‘जो सरकार लोगों को रोजी-रोटी ना दे सके, उसे उखाड़ कर फेंक देना नौजवानों का दायित्व है'! भगतसिंह का नाम आज भी भारत के हर कोने में जनता पर होने वाले ज़ुल्म, अन्याय और शोषण के विरुद्ध जनता की आवाज़ का उसी स्तर पर प्रतिनिधित्व करता है जितना कि तब करता था। यही कारण है कि आज कई दशाब्दियाँ बीत जाने के बाद भी वर्तमान सत्ता उनके विचारों को जनता की नज़रों से छुपाकर रखने के पूरे प्रयास करती है। इसलिए साथियों आज एक नौजवान होने के नाते हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव के शहादत दिवस को सिर्फ़ एक रस्म अदा करने के लिए मनाये जाने वाले दिवस के रुप में मनाने के बजाये हम संकल्प लें कि हम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के क्रान्तिकारी विचारों को हर नौजवान, मजदूरों, मेहनतकश  किसानो  तक पहुचायेंगे ताकि हमारी आने वाली पीढियाँ एक ऐसे समाज में साँस ले पाए जहाँ मेहनतकश  जनता ही उत्पादन और राजकाज के ढांचे की स्वामी हो,जहां पूंजी के द्वारा श्रम का और मानव के द्वारा मानव का शोषण असम्भव हो जाये!


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