कभी-कभी पहाड़ों में हिमस्खमलन सिर्फ एक ज़ोरदार आवाज़ से ही शुरू हो जाता है

Tuesday, July 1, 2014




पिछले कुछ वर्षों में बहुचर्चित निर्भया काण्ड और बदायूं काण्ड को छोड़ दें तो इन मसलों के अलावा भी ऐसी बहुत सी नारी-विरोधी घृणित घटनायें हुईं हैं जिन पर  मीडिया ने चुप्पी साधे रखी। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते’ की डींग मारने वाले हमारे देश में भगाणा में दलित बच्चियों के साथ सवर्ण दबंगों द्वारा किये गये बलात्कार का मसला हो या आदिवासी और ग़रीब इलाकों में बच्चियों एवं महिलाओं की तस्करी के मसले हों, ये सभी मसले देश के “चिन्ताशील” मीडिया में वैसी जगह नहीं बना पाते जैसे कि मसलन मशहूर हस्तीयों के निजी जीवन के फूहड़ किस्से। ऐसे मसलों पर मीडिया में होने वाली चर्चा समस्या की जड़ तक पहुंचने के बजाये मात्र कुछ सतही लक्षणों पर केंद्रित होकर एक तमाशे के रूप में समाप्त हो जाती है जिसमें अंत में मात्र पुलिस को निकम्मा कहकर या उल्टे महिलाओं के ही पहनावे एवं आधुनिकता और खुलेपन को ही जिम्मेदार ठहराकर या चुनावी मदारी पार्टीयों द्वारा एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर चर्चा का अंत हो जाता है! खाते-पीते मध्यवर्ग का एक हिस्सा ऐसी घटनाओं के विरोध में कुछ दिनों का धरना एवं जंतर-मंतर पर मोमबत्ती प्रदर्शन की रस्म निभाकर और घटना की भर्त्सना मात्र करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है! महिलाओं की समस्या पर अपने घड़ियाली आंसू बहाकर जनता में अपनी ’’जनपक्षधर मीडिया’’ की छवि को चमकाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने के बाद फिर से वही फूहड़ अश्लील विज्ञापन-फिल्मों-गानों का दौर शुरु हो जाता है जो महिलाओं को एक बिकाउ माल के रूप में पेश करके आम जनता में दुबारा उन्ही स्त्री-विरोधी मूल्यों को पैठाता है! क्या ऐसी घटनाओं के पीछे महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति, जातीय उत्पीड़न के आर्थिक पहलू, तथा पूँजीवादी ‘खाओ-पियो मौज करो‘ की वाहियात कुसंस्कृति पर विचार नहीं किया जाना चाहिये जो कि ऐसी समस्याओं का मूल कारण हैं।


Sunday, May 18, 2014

एक बार फिर पूरी दुनिया में उथल-पुथल की आहटें हो रही हैं,



एक बार फिर पूरी दुनिया में उथल-पुथल की आहटें हो रही हैं, कुछ मुठ्ठीभर परजीवियों द्वारा व्यापक आबादी पर थोपी गई ग़ैर-बराबरी, ग़रीबी, बेरोजगारी के खिलाफ लोग फिर सड़कों पर आ रहे हैं और शोषण, अत्याचार तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलन्द कर रहे हैं। चंद पूँजीवादी घरानों के पैसों से चलने वाले ज्यादातर मीडिया के स्क्रीनों से इस उथल-पथल की तस्वीरें भले ही नदारद हों लेकिन ज़मीनी स्तर पर एक बार फिर बदलाव की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है। सम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण के दौर में निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के तहत जारी खुली पूँजीवादी लूट और मुनाफ़ाख़ोरी तथा अमानवीयता से तंगहाल जनता सड़कों पर अपना रोष व्यक्त कर रही है। भारत की कई फै़क्ट्रियों के मज़दूर हड़ताल और अन्य रूपों में शोषण और उत्पीड़न का विरोध कर रहे हैं, चीन के हज़ारों मज़दूर हड़ताल पर हैं, मिस्र में सैन्य तख़्तापलट के बाद लागू तानाशाही में हो रहे खुले शोषण के विरुद्ध वहाँ के हज़ारों लोग प्रदर्शन कर हैं, वेनाजुएला में अमरीकी-समर्थक विपक्षी दल द्वारा जनता के बीच हिसा भड़काने की कोशिश के विरोध में जनता सड़कों पर है, साथ ही कई और देशों में मेहनतकश जनता सड़कों पर प्रदर्शन और विरोध कर रही है।

इन ख़बरों को देख-सुन कर कोई भी जीवित हृदय इंसान वर्तमान परिस्थितियों पर सोचे बिना नहीं रह सकता। इतिहास को उठाकर देखें तो अन्याय, शोषण और ग़ैर-बराबरी पर आधारित व्यवस्था के विरुद्ध संघर्षों की शुरूवात चाहे किसी भी देश में हुई हो और किन्हीं लोगों ने संघर्ष का आरम्भ किया हो, लेकिन उसका असर पूरी दुनिया के सभी देशों में लोगों के जीवन पर पड़ा। चाहे फ्रांस की जनवादी क्रान्ति ने पहली बार समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुत्व का नारा बुलन्द किया हो, या अमेरिका में शिकागो के मज़दूरों ने पहली बार मज़दूरों ने काम के घण्टे 8 निर्धारित करने की माँग की हो, या रूस में पहली बार सरकार का पूरा नियन्त्रण क्रान्ति के माध्यम से मज़दूरों ने अपने हाथों में ले लिया हो, या सोवियत यूनीयन में पहली बार हर रूप में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिले हों, इन सभी संघर्षों और विचारों का असर पूरी दुनिया के हर देश में और हर व्यक्ति के जीवन पर पड़ा।

आज की परिस्थितियों में यह सोचने का विषय है कि क्यों कड़ी से कड़ी मेहनत करने के बावजूद ज़्यादातर लोगों को जीने के लिये अथक संघर्ष करना पड़ रहा है, और काम करने के लिये तैयार और काबिल करोड़ों नौजवानों को बिना काम के सड़कों पर धकेल दिया गया है। जबकि कुछ मुठ्ठीभर लोग, जो शेयर बाजार के जुआरी, दलाल, सट्टेबाज़ और ठेकेदार हैं, वे बिना किसी काम के सारी सुविधाँए हड़प रहे हैं। जनता की मेहनत की लूट का क्या हो रहा है इसका अन्दाज बीबीसी की एक रिपोर्ट से लगा सकते हैं कि आज दुनिया के 85 अमीर घरानों की सम्पत्ति दुनिया की सबसे ग़रीब आधी आबादी (लगभग 350 करोड़) की कुल सम्पत्ति से अधिक है।

इस खुले शोषण और मुनाफाखोरी पर खड़ी व्यवस्था के आपराधिक चरित्र को ध्यान में रखते हुए हमें इतिहास का यह सबक भी ध्यान में रखना होगा कि असंतोष के दौर में यदि जनता की कोई क्रान्तिकारी ताकत, जो एक प्रगतिशील विकल्प प्रस्तुत करती हो, मौजूद न हो तो इस अशंतोष का फायदा उठाने के लिये पूँजीवाद द्वारा खड़ी की गईं प्रतिक्रियावादी ताकतें हरपल तैयार रहती हैं। ऐसे में आज ‘विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार को तेज करने’ (भगत सिंह के शब्दों में) और मीडिया तथा अखबारों द्वारा हाँकी जा रही अन्धी भेंड़ चाल में न चलकर एक जनपक्षधर विकल्प तलाशने और खड़ा करने का समय है, जिससे कि समाज के हर व्यक्ति की जीवन परिस्थितियों मे वास्तव में सकारात्मक आमूलगामी बदलाव हो सकें।  

                              

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