कभी-कभी पहाड़ों में हिमस्खमलन सिर्फ एक ज़ोरदार आवाज़ से ही शुरू हो जाता है

Thursday, August 29, 2013

कौन आज़ाद हुआ? किसके माथे से गु़लामी की स्याही छूटी?!




आज़ादी मिलने के बाद शायर अली सरदार ज़ाफ़री ने ये पंक्तियां लिखी थी और आज भी हमारे समाज पर ये हूबहू लागू होती हैं। मनमोहन सिंह के चमकते ‘भारत निर्माण‘ और मोदी के उजले ‘वाईब्रेंट गुजरात‘ के पीछे छुपी नंगी सच्चाई यह है कि आज देश की 77 फ़ीसदी आबादी 20 रुपया रोज़ से कम पर गुज़ारा करती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल के मसले पर अब सरकार ने  भी स्वीकार कर ही लिया कि आज़ादी के 65 साल बाद भी देश की 65 फ़ीसदी आबादी ग़रीब है! 2004-5 से 2009-10 के बीच कुल रोज़ग़ार निर्माण 1 लाख था पर इस दौरान हर साल लगभग 12 लाख लोग रोज़ग़ार पाने के लिये लम्बी लाईन में जा खड़े हुए। आज कुल मज़दूरों में 93 फ़ीसदी ठेके पर बहुत कम वेतन पर बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे हैं। 1990 में शुरू हुए ‘आर्थिक सुधारों‘ के बाद पूरे देश में 150 से ज़्यादा श्रम क़ानूनों की धज्ज्यिां उड़ाते हुये लगातार अंधाधुंध ठेकाकरण, निजीकरण, छंटनी, तालाबंदी हो रही है। सरकारी नौकरियां  धीरे-धीरे खत्म करते हुये उन्हें भी ठेके पर दिया जा रहा है! सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य आदि को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया है। आम मेहतनकशों के बच्चे या तो सरकारी स्कूल में सड़ा हुआ बासी भोजन खाकर मर रहे हैं या सरकारी अस्पताल की नकली दवाइयों से। भारत के टैक्सचोर अमीर दुनिया में सबसे कम टैक्स देते हैं बावजूद इसके कि 1990 में भारत के अरबपतियों की दौलत जीडीपी के 4 फ़ीसदी के आसपास से बढ़कर 2009 में जीडीपी के 23 फ़ीसदी के आसपास पहुंच गयी! उधर मोदी के गुजरात में 31 फ़ीसदी लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे हैं, 2004-05 और 2009-10 के एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक रोज़ग़ार निर्माण की दर लगभग लगभग शून्य है, और 50 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं! क्या ऐसी ही असमानता और ग़ैर-बराबरी से भरी आधी-अधूरी आज़ादी का सपना भगत सिंह और आज़ाद जैसे लोगों ने देखा था? आज एक बार फि़र ज़रूरत है कि उन शहीदों के सपनों को याद करते हुये उनसे प्रेरणा लेकर नये संकल्प के साथ एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए संघर्ष की तैयारी की जाये!
  







Saturday, July 20, 2013

उत्तराखंड में मची तबाही मुनाफ़ाखोरी पर टिके पूंजीवादी ‘विकास’ का दुष्परिणाम है!


उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ के कारण अब तक जारी आंकड़ों के अनुसार दस हज़ार से ज़्यादा लोग अपनी जान गँवा चुके हैं और कई लापता हैं। स्थिति कितनी भयानक है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाढ़ के कारण कई गाँव पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं, खेत नष्ट हो गये हैं, जो गाँव और शहर अभी कुछ दिन पहले तक आबाद थे अब वहां मौत का भयानक सन्नाटा पसरा हुआ है। केदारनाथ, बद्रीनाथ समेत इतने सारे मंदिर, धर्मनगरी हरिद्वार, और हिन्दू धर्म के तथाकथित 33 करोड़ ‘देवी-देवता’ मिलकर भी इस विनाश को नहीं रोक सके! ‘देवताओं’ का जन्म प्रकृति के भय से हुआ है और प्रकृति की शक्ति के आगे ये तमाम कपोल-कल्पित ‘देवी-देवता’ लाचार हैं और जो काम ये तथाकथित ‘देवी-देवता’ नहीं कर सकते वो सारे काम कर्मठ मनुष्य मिलजुलकर करता है जैसे कि उत्तराखंड में किया भी गया और आम जनता के सम्मिलित प्रयास से वहां फंसे कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। अलबत्ता इन राहत कार्यों का एक स्पष्ट वर्ग चरित्र भी था। मसलन खाते-पीते पर्यटकों की चिंता तो सबको थी पर इन तमाम धर्मस्थलों पर और वहां के तमाम होटलों, रेस्टहाउसों, धर्मशालाओं मे काम करने वाले और केदारनाथ-बद्रीनाथ आदि में खच्चरों पर बैठाकर पर्यटकों को उपर-नीचे लाने-ले जाने वाले आम ग़रीब मेहनतकशों के जीवन को बचाने में मालिकों की सरकारों को इतनी चिन्ता नहीं थी। नरेंद्र मोदी को भी उनकी चिन्ता नहीं थी जो टनाटन लक्ज़री गाड़ीयों और चार्टर विमान में केवल खाते-पीते गुजराती मध्यवर्ग को अपने साथ विमान में फुर्र से उड़ा कर वापस ले गये और राहुल गांधी को भी उनकी चिन्ता नहीं थी जिनके इंतजार में राहत सामग्री से भरे ट्रकों को 2-3 दिन तक केवल इसलिये रोककर रखा गया ताकि राहुल गांधी का उन्हें रवाना करते हुये का फोटो खिंचवाकर सस्ता बाजारु प्रचार किया जा सके। ये है इन पूंजीवादी राजनीतिक दलों का असली चेहरा जो अपनी चुनावी गोट लाल करने के लिये आम लोगों की लाशों पर घटिया वोटबैंक की राजनीति करते हैं।
इसी तबाही के दौरान हमें धर्म के असली रुप के दर्शन भी हुये जब लगातार ऐसी खबरें आती रहीं कि साधु-संतों ने लूटपाट करके पर्यटकों से पैसे छीने। आम तौर ये साधु-संत, पादरी, मौलवी धर्मस्थलों में मुसीबतज़दा जनता की धार्मिक भावनाओं से खेलकर उसकी जेब धर्म के नाम पर काटते हैं पर यहां तो रुपया देखकर धर्म का ये नकली संयम भी टूट गया।
उत्तराखंड में जो तबाही मची है उसका कारण कोई दैवीय प्रकोप नहीं है जैसा कि तमाम चुनावी पार्टियों के नेता गला फाड़-फाड़ कर कह रहे हैं। यह सब बातें जानबूझकर जनता की आँखों मे धूल झोंकने के लिए कही जा रही हैं ताकि आम जनता इस तबाही के पीछे जो असली कारण हैं उन कारणों को कभी जान न पाये। इस तबाही का मुख्य कारण है लूट-खसोट पर टिकी मुनाफ़ाखोर, अमानवीय पूँजीवादी व्यवस्था। सच्चाई तो यह है कि जबसे उत्तराखंड राज्य बना है तब से हुआ सिर्फ़ इतना है कि लूट-खसोट बहुत तेज़ हो गयी है। उत्तराखंड के हालिया तेरह वर्षों के पूंजीवादी ‘विकास’ का नतीजा सबके सामने है। इस ‘विकास’ के केंद्र में वहां की आम जनता के लिये मूलभूत, शिक्षा, चिकित्सा, और रोजगार या हिमालय के जीव, वनस्पति और प्रकृति का संरक्षण कोई मुद्दा नहीं है। इस ‘विकास’ का फ़ायदा केवल वहां काम कर रही कम्पनियों, बिल्डरों, टूर-ट्रैवल आपरेटरों, ठेकेदारों व शराब-जंगल-वन माफिया को हुआ है जिसके चलते वहां के जंगल, जल और जमीन के संसाधनों का अनियंत्रित दोहन हो रहा है। ‘विकास’ और पर्यटन के इसी नवधनाढ्य मॉडल के चलते वहां पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर नदियों के किनारे अवैध रुप से कई बहुमंजिला होटल, गैस्टहास, दुकानें आदि खुल गये हैं, सड़कें बनाने के लिए पहाड़ों को डायनामाइट लगाकर तोड़ा जा रहा है, पेड़ों की अंधाधुध कटाई हो रही है, पर्यावरण को नष्ट करने के लिये कुख्यात बड़े-बड़े विशालकाय बाँधों का जाल बिछाया जा रहा है। उत्तराखंड में इस समय छोटी-बड़ी 558 परियोजनाएं बन रहीं हैं, अकेले गंगा नदी पर 70 परियोजनाएं बन रही हैं जिसके चलते लाखों हैक्टेयर घने जंगल नष्ट हो रहे हैं और पहाड़ खोखले किये जा रहे हैं। दूसरी तरफ आपदा प्रबंधन के नाम पर यहां की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है जबकि यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अत्यंत  संवेदनशील है लेकिन सरकार को लोगों की जान से ज़्यादा मालिकों के मुनाफ़े व हित की चिंता है इसलिये सब जानते हुए भी वह लोगों की जिन्दगी से खेल रही है। यह बात सही है कि मनुष्य ने अब तक जो भी विकास किया है वह प्रकृति पर विजय प्राप्त करके ही किया है तथा यह भी उतना ही सत्य है कि अगर इन प्राकृतिक संसाधनों का सही तरह से उपयोग किया जाये तो प्रकृति को नुकसान पहुँचाये बिना भी इनका उपयोग जनता की सेवा हेतु किया जा सकता है परंतु ऐसा इस लुटेरी, मुनाफ़ाखोर व्यवस्था में संभव नही है जहाँ इनका उपयोग जनता के कल्याण के लिए करने के बजाये मालिकों का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिये किया जाता है। जनता के कल्याण के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग तो केवल एक ऐसी व्यवस्था मे ही संभव है जहाँ इन संसाधनों पर कुछ मुठ्ठीभर धन्नासेठों का कब्जा न हो व उन पर समस्त जनता का अधिकार हो।

Sunday, June 16, 2013

चुनावी रैलियों और नेताओं की जुमलेबाज़ी के दौर में यह एक क्रान्तिकारी विकल्प की तलाश का समय है !!

आज-कल चुनावी रैलियों का दौर शुरू हो चुका है और अनेक ”जनप्रतिनिधि” अपने-अपने विलासिता के महलों से निकल कर कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच जनता से रूबरू होने के लिये सामने आ रहे हैं। पूरे देश में रैलियाँ हो रही हैं। करोंड़ों रुपया खर्च करके टीवी चैनलों पर बहसों और विज्ञापनों के ज़रिये कांग्रेस, बीजेपी और संसदीय वामपंथियों सहित अनेक चुनावी पार्टियाँ जनता को रिझाने की कोशिश में लगी हैं। हर पार्टी यह सिद्ध करने की कोशिश कर रही है कि जनता को उसके दुखों से मुक्ति दिलानें का वही एकमात्र विकल्प है! लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इन पार्टियों के चुनावी प्रचार में जनता की समस्याओं को सिर्फ़ गिनाया जाता है, और कुछ कल्याणकारी योजनाओं (जैसे सस्ते दामों में अनाज बाँटने) का दिलासा दिया जाता है, परन्तु आम मेहनतकश ग़रीब जनता के जीवन से जुड़ी मूलभूत माँगों को कोई स्थान नही दिया जाता। कुछ पार्टियाँ ”आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध” या ”मन्दिर-मस्जिद के निर्माण” के नाम पर जनता से वोट माँगती हैं तो कुछ ”जातीय मुक्ति के लिये” या ”तेज आर्थिक विकास दर” जैसी माँगों को पूरा करने के लिए ख़ुद को जनता के सामने मसीहा के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। 
लेकिन इस चुनावी जुमलेबाजी की सच्चाई यह है कि आज बेरोज़ग़ारी के कारण देश के करोड़ों नौजवानों के सामने भविष्य का कोई विकल्प नहीं है, देश के लाखों बच्चे हर साल कुपोषण या चिकित्सा के अभाव में मर जाते हैं, खुले ठेकाकरण के चलते करोड़ों मज़दूर अमानवीय स्थितियों में 12 से 16 घण्टे काम करने के लिये मजबूर हैं और हज़ारों किसान हर साल ग़रीबी के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। 2007 की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत की 77 प्रतिशत (84 करोड़) आबादी प्रति दिन 20 रुपये से कम पर गुज़ारा करती है। दूसरी ओर ”विकासशील” भारत ने ग़रीबों और अमीरों के बीच असमानता के मामले में पूरी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है । आज करोड़ो मज़दूरों किसानों और नौजवानों को आजीविका के लिये अनिश्चित संघर्ष में धकेल दिया गया है, जिनकी मेहनत पर कुछ मुट्ठीभर लोग विलासिता के समुद्र में लोट लगा रहे हैं।
 इस सब के बीच संसदीय सरकार चुनने की प्रक्रिया की विडम्बना यह है कि यह अपने आप में गैर-जनतान्त्रिक है। वास्तव में जनता के एक छोटे से हिस्से का समर्थन पाकर ही पार्टियाँ बहुमत हासिल कर सरकार बना लेती हैं, जिसे जनता की सरकार कहा जाता है। जैसे 2009 लोकसभा चुनाव में सत्ता में आई कांग्रेस को कुल 28.6 प्रतिशत वोट ही मिले थे, और बाकी 72.4 प्रतिशत जनता ने उसका समर्थन नहीं किया था। यही राज्य सरकारों के चुनाव में भी होता है। इसके साथ नेताओं की सम्पत्ति और उनके द्वारा खर्च किये जाने वाले धन और देशी-विदेशी उद्योगपतियों द्वारा पार्टियों को दिये जाने वाले करोड़ों के चंदों को देख कर यह ठोस पुष्टि हो जाती है कि वर्तमान पूँजीवादी जनतन्त्र जनता का नहीं, बल्कि पूँजीपतियों तथा पैसेवालों का पैसा-तन्त्र है।
वर्तमान संसद में ज़्यादातर करोड़पति, उद्योगपति, बिल्डर या शेयर-ब्रोकर जैसी पृष्ठभूमि के नेता हैं। यही कारण है कि सभी पार्टियाँ नीतियाँ बनाकर देशी विदेशी पूँजी को ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा निचोड़ने के लिये खुली छूट देती हैं, और वर्तमान आर्थिक ढाँचे को बरकरार रखने के लिये उसे मैनेज करने की अपनी भूमिका अदा करती हैं। इस पूरे चुनावी तमाशे के बीच जनता का तो कुछ भला नहीं होता, लेकिन मीडिया, अख़बार और चुनावी प्रचार के माध्यम से शासक वर्ग लोगों के दिमाग़ में ”जनता की ताक़त” का एक भ्रम ज़रूर पैदा कर देता है। सच यह है कि हर सरकार, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, देशी-विदेशी बैंकरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों और ठेकेदारों के हितों के लिये काम करती है। पूँजीवादी जनतंत्र का यह सच अब किसी से छुपा नहीं है कि ”जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिये” सरकार का जुमला राजनीतिक पार्टियों द्वारा वोटों के लिये जनता को फंसाने वाले चारे से अधिक कुछ नहीं है। इसके बावजूद अन्ना हज़ारे और केजरीवाल जैसे लोग पूँजीवादी जनतन्त्र के इस भ्रम को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं कि यदि जनता ”ईमानदार लोगों” को संसद में पहुँचा दे तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।
संसद और सरकारों की असलियत अब किसी से छुपी नहीं है। ऐसे में आज हमें एक ठोस क्रान्तिकारी विकल्प प्रस्तुत करना होगा और समाज के बुनियादी ढाँचे में आमूलगामी बदलाव के लिये जनता की सक्रिय भागीदारी को लामबन्द करना होगा। पूरे ढांचे को बदले बिना एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी को संसद में पहुँचाने की माँग करने से आम जनता के जीवन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।



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