कभी-कभी पहाड़ों में हिमस्खमलन सिर्फ एक ज़ोरदार आवाज़ से ही शुरू हो जाता है

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Saturday, July 20, 2013

उत्तराखंड में मची तबाही मुनाफ़ाखोरी पर टिके पूंजीवादी ‘विकास’ का दुष्परिणाम है!


उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ के कारण अब तक जारी आंकड़ों के अनुसार दस हज़ार से ज़्यादा लोग अपनी जान गँवा चुके हैं और कई लापता हैं। स्थिति कितनी भयानक है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाढ़ के कारण कई गाँव पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं, खेत नष्ट हो गये हैं, जो गाँव और शहर अभी कुछ दिन पहले तक आबाद थे अब वहां मौत का भयानक सन्नाटा पसरा हुआ है। केदारनाथ, बद्रीनाथ समेत इतने सारे मंदिर, धर्मनगरी हरिद्वार, और हिन्दू धर्म के तथाकथित 33 करोड़ देवी-देवतामिलकर भी इस विनाश को नहीं रोक सके!देवताओंका जन्म प्रकृति के भय से हुआ है और प्रकृति की शक्ति के आगे ये तमाम कपोल-कल्पित देवी-देवतालाचार हैं और जो काम ये तथाकथितदेवी-देवतानहीं कर सकते वो सारे काम कर्मठ मनुष्य मिलजुलकर करता है जैसे कि उत्तराखंड में किया भी गया और आम जनता के सम्मिलित प्रयास से वहां फंसे कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। अलबत्ता इन राहत कार्यों का एक स्पष्ट वर्ग चरित्र भी था। मसलन खाते-पीते पर्यटकों की चिंता तो सबको थी पर इन तमाम धर्मस्थलों पर और वहां के तमाम होटलों, रेस्टहाउसों, धर्मशालाओं मे काम करने वाले और केदारनाथ-बद्रीनाथ आदि में खच्चरों पर बैठाकर पर्यटकों को उपर-नीचे लाने-ले जाने वाले आम ग़रीब मेहनतकशों के जीवन को बचाने में मालिकों की सरकारों को इतनी चिन्ता नहीं थी। नरेंद्र मोदी को भी उनकी चिन्ता नहीं थी जो टनाटन लक्ज़री गाड़ीयों और चार्टर विमान में केवल खाते-पीते गुजराती मध्यवर्ग को अपने साथ विमान में फुर्र से उड़ा कर वापस ले गये और राहुल गांधी को भी उनकी चिन्ता नहीं थी जिनके इंतजार में राहत सामग्री से भरे ट्रकों को 2-3 दिन तक केवल इसलिये रोककर रखा गया ताकि राहुल गांधी का उन्हें रवाना करते हुये का फोटो खिंचवाकर सस्ता बाजारु प्रचार किया जा सके। ये है इन पूंजीवादी राजनीतिक दलों का असली चेहरा जो अपनी चुनावी गोट लाल करने के लिये आम लोगों की लाशों पर घटिया वोटबैंक की राजनीति करते हैं।
इसी तबाही के दौरान हमें धर्म के असली रुप के दर्शन भी हुये जब लगातार ऐसी खबरें आती रहीं कि साधु-संतों ने लूटपाट करके पर्यटकों से पैसे छीने। आम तौर ये साधु-संत, पादरी, मौलवी धर्मस्थलों में मुसीबतज़दा जनता की धार्मिक भावनाओं से खेलकर उसकी जेब धर्म के नाम पर काटते हैं पर यहां तो रुपया देखकर धर्म का ये नकली संयम भी टूट गया।
उत्तराखंड में जो तबाही मची है उसका कारण कोई दैवीय प्रकोप नहीं है जैसा कि तमाम चुनावी पार्टियों के नेता गला फाड़-फाड़ कर कह रहे हैं। यह सब बातें जानबूझकर जनता की आँखों मे धूल झोंकने के लिए कही जा रही हैं ताकि आम जनता इस तबाही के पीछे जो असली कारण हैं उन कारणों को कभी जान न पाये। इस तबाही का मुख्य कारण है लूट-खसोट पर टिकी मुनाफ़ाखोर, अमानवीय पूँजीवादी व्यवस्था। सच्चाई तो यह है कि जबसे उत्तराखंड राज्य बना है तब से हुआ सिर्फ़ इतना है कि लूट-खसोट बहुत तेज़ हो गयी है। उत्तराखंड के हालिया तेरह वर्षों के पूंजीवादी विकासका नतीजा सबके सामने है। इस विकासके केंद्र में वहां की आम जनता के लिये मूलभूत, शिक्षा, चिकित्सा, और रोजगार या हिमालय के जीव, वनस्पति और प्रकृति का संरक्षण कोई मुद्दा नहीं है। इसविकासका फ़ायदा केवल वहां काम कर रही कम्पनियों, बिल्डरों, टूर-ट्रैवल आपरेटरों, ठेकेदारों व शराब-जंगल-वन माफिया को हुआ है जिसके चलते वहां के जंगल, जल और जमीन के संसाधनों का अनियंत्रित दोहन हो रहा है। विकासऔर पर्यटन के इसी नवधनाढ्य मॉडल के चलते वहां पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर नदियों के किनारे अवैध रुप से कई बहुमंजिला होटल, गैस्टहास, दुकानें आदि खुल गये हैं, सड़कें बनाने के लिए पहाड़ों को डायनामाइट लगाकर तोड़ा जा रहा है, पेड़ों की अंधाधुध कटाई हो रही है, पर्यावरण को नष्ट करने के लिये कुख्यात बड़े-बड़े विशालकाय बाँधों का जाल बिछाया जा रहा है। उत्तराखंड में इस समय छोटी-बड़ी 558 परियोजनाएं बन रहीं हैं, अकेले गंगा नदी पर 70 परियोजनाएं बन रही हैं जिसके चलते लाखों हैक्टेयर घने जंगल नष्ट हो रहे हैं और पहाड़ खोखले किये जा रहे हैं। दूसरी तरफ आपदा प्रबंधन के नाम पर यहां की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है जबकि यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अत्यंत  संवेदनशील है लेकिन सरकार को लोगों की जान से ज़्यादा मालिकों के मुनाफ़े व हित की चिंता है इसलिये सब जानते हुए भी वह लोगों की जिन्दगी से खेल रही है। यह बात सही है कि मनुष्य ने अब तक जो भी विकास किया है वह प्रकृति पर विजय प्राप्त करके ही किया है तथा यह भी उतना ही सत्य है कि अगर इन प्राकृतिक संसाधनों का सही तरह से उपयोग किया जाये तो प्रकृति को नुकसान पहुँचाये बिना भी इनका उपयोग जनता की सेवा हेतु किया जा सकता है परंतु ऐसा इस लुटेरी, मुनाफ़ाखोर व्यवस्था में संभव नही है जहाँ इनका उपयोग जनता के कल्याण के लिए करने के बजाये मालिकों का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिये किया जाता है। जनता के कल्याण के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग तो केवल एक ऐसी व्यवस्था मे ही संभव है जहाँ इन संसाधनों पर कुछ मुठ्ठीभर धन्नासेठों का कब्जा न हो व उन पर समस्त जनता का अधिकार हो।

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